Sunday, February 21, 2016

चम्पक वन में जम्बो हाथी की किराने की दुकान थी

21st February is International Mother Language Day and our blog is hosting a 2 day celebration of languages. A series of blog posts by people from different walks of life - sharing their thoughts on languages, memories and more. International Mother Language Day is an observance held annually on 21 February worldwide to promote awareness of linguistic and cultural diversity and multilingualism.


(This post was sent by Pooja Saxena. Pooja makes and works with type [http://poojasaxena.in]. She also cooks [http://enzo-the-baker.tumblr.com]. Follow her adventures on Twitter or Instagram.)

कुछ मेरी यादाश्त है और बाक़ी अम्मा और पापा ने बताया है कि जब मैं तीन-चार बरस की थी और मैंने नया-नया अक्षरों को पहचानना शुरू किया था, तब मैं पढ़ना सीखने के लिए बहुत आतुर थी। यह काफ़ी नहीं था कि कोई मुझे कहानियाँ पढ़कर सुनाए, मुझे उन्हे खुद पढ़ना था। न जाने यह बात कैसे दिल में घर कर गई थी कि दुनिया भर की सारी दिलचस्प चीज़ें किताबों में छुपी हैं। मैं उन्हे तुरंत जानना चाहती थी। स्कूल में पढ़ना सिखाए जाने तक का इंतज़ार करने का भी संयम नहीं था।
स्कूल शुरू होने के कुछ दिन पहले जब बाज़ार से पूरे साल की किताबें आयीं तब मुझे लगा कि किताबों में डूब जाने का इससे बढ़िया मौका नहीं मिलेगा। किताबें खोलीं, उन्हे पढ़ने की कोशिश की, पर यह भूल गई कि क-ख-ग पहचानने से ज़्यादा कुछ नहीं आता था। वाक्य तो दूर, शब्द भी पढ़ पाना एक ऊँचे पहाड़ चढ़ने के समान था। इस हार ने मुझे खूब निराश किया−फूट-फूट कर रोई, हताश होकर कहने लगी कि मैं कभी पढ़ना नहीं सीख पाऊँगी। दुनिया देखे आधा दर्ज़न साल भी नहीं हुए थे, पर नाटक करने में मैं पहले से ही माहिर थी। अम्मा और पापा ने बहलाया-फुसलाया और हाथ में उस महीने की चम्पक पकड़ा दी। कहा कि मन लगाकर बार-बार कोशिश करोगी तो ज़रूर सीख जाओगी।
अब जब भी मुझे समय मिलता मैं खाने की मेज़ पर अपनी चम्पक लेकर बैठ जाती। हाथी के चित्र वाली एक कहानी पसंद कर ली थी और हर वक़्त उसी को पढ़ने का प्रयास जारी रहता था। अम्मा बताती हैं कि उन्हे और पापा को कहानी का पहला वाक्य रट गया था, और क्यूँ नहीं होता? मैं हफ़्ते-दस दिन से उसी को पढ़ने में अटक रही थी। अगर वाक्य के चौथे या पाँचवे शब्द को पढ़ने में हिचकिचा जाती तब फिर पहले शब्द से पढ़ना शुरू कर देती।
मुझे आज भी याद है कि दोपहर का समय था, मैं जहाँ रोज़ बैठती थी वहीं बैठी थी, कमरे की खिड़की से मुझे छत पर कपड़े फैलाती अम्मा नज़र आ रहीं थीं और पापा रसोई में थे। अनगिनत बार कोशिश करने के बाद, एक बार फिर मैंने पढ़ना शुरू किया—“चम्पक… वन… में… जम्बो… हाथी… की… किराने… की… दुकान… थी। चम्पक वन में जम्बो हाथी की किराने की दुकान थी! अम्मा और पापा दौड़े मेरे पास आए, मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था—आखिरकार मैंने पढ़ना सीख लिया था।

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