Monday, February 22, 2016

अविरल बहती धारा में छुपा हूँ मैं भी कहीं

21st February is International Mother Language Day and our blog is hosting a 2 day celebration of languages. A series of blog posts by people from different walks of life - sharing their thoughts on languages, memories and more. International Mother Language Day is an observance held annually on 21 February worldwide to promote awareness of linguistic and cultural diversity and multilingualism.


(This post was sent by Rajesh Kher. Rajesh is an editor at Pratham Books. Through these years, he has not only edited and translated books but also coordinated lit fests like Bookaroo, JLF, Samanvay, New Delhi World Book Fairs and joined hands with organisations like Nehru Memorial Museum & Library, CBSE, NEOR by NCERT and a host of non-profits. He has been supervising books in many Northern & Eastern Indian languages and also had the opportunity to be a part of the Adikahaani Series and the Urdu programme. His interests are music, classical performing arts, casual writing, theater and film making. He loves spending time with children and young people and basically has a lot of fun in whatever he does.)

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"हा टॅंगो, नील टॅंगो, ताज फुटुरथम..." दादी ने न जाने कितनी बार यह कहानी सुनाई थी कि एक फ़क़ीर एक नाशपती के पेड़ के नीचे बैठा था और एक कौवा किसी टहनी पर बैठा था। एक नाशपती उसकी चोंच से चोट खाकर गिर गया और नीचे बैठे हुए फ़क़ीर के सर पर जा गिरा। इस चोट से बौखलाकर उस फ़क़ीर ने कौवे से शिकायत की कि उसका तो सर ही फूट जाता। मैं और मेरा छोटा भाई हँसते और इससे आगे के कौवे और फ़क़ीर के बीच के संवादों को सुनते। भला कौवे को फ़क़ीर की बात कैसे समझ में आई? कौवे भी कहीं बोलते हैं? लेकिन दादी हमारे प्रश्नों के उत्तर देने की हालत में नहीं होतीं क्योंकि हम दोनो से ज़्यादा तो हँस हँस कर वे दोहरी हुई जाती थीं! दादी की ख़ासियत थी कि जब वे कोई चुटकुला या व्यंग्य से भरी कहानी या फिर किसी पड़ोसिन का कोई मज़ेदार क़िस्सा सुनातीं तो सुनने वाले तो बाद में हँसते, दादी का शुरू के कुछ शब्दों के बाद ही हँसी से बुरा हाल हो जाता था। वो दोहरी हो जातीं हँसते हँसते और सुनने वाले की ज़िम्मेदारी थी कि वह किसी तरह से उस हँसी के वेगवान झरने के बहाव को सहते हुए पूरा चुटकुला दादी से कहलवा पाए। लगभग नामुमकिन काम।

ऐसी ही दादी के घर में उनके बड़े बेटे की बहु के रूप में जब १५ वर्षीया लड़की का प्रवेश हुआ तो दोनो कैसे एक दूसरे की बात समझते थे, यह तो वे ही बता सकते हैं क्योंकि दादी को मुश्किल से हिंदी, उर्दू के दो चार शब्द ही आते थे और उनकी बहु का भी बिलकुल यही आलम था। एक फ़र्राटे से कश्मीरी बोलतीं तो दूसरी के पास चुप रहने या असमिया बोलने के सिवा कोई रास्ता नहीं था!

कुछ ऐसा ही हुआ होगा जब दुनिया के अलग अलग भागों से खोजी नाविक, साहसी लोगों की टोलियाँ, सैनिकों के दस्ते भारत के विभिन्न भागों तक पहुँचे होंगे। कैसे बात की होगी उन्होंने पहली बार यहाँ के लोगों से, क्या बोला होगा वास्को डिगामा ने उन लोगों से जिन्होंने अचानक एक दिन एक जहाज़ में अनजाने विदेशियों को समुद्र तट पर उतरते देखा होगा? मुझे पता नहीं, लेकिन जब भी मैं दादी और उनकी बड़ी बहु के शुरुआती दौर के बारे में सोचता हूँ, ऐसे प्रश्न मेरे दिमाग़ में आते रहते हैं। जो भी हो, उन दोनो ने शीघ्र ही आपस में बात करना सीख लिया था और बहु ने तो इतने अच्छे से कश्मीरी सीख ली थी कि उनके पहले बच्चे ने भी स्वाभाविक रूप में कश्मीरी में तुतलाना शुरू किया। और मैं इस बात को अच्छी तरह जानता हूँ क्योंकि वह कश्मीरी में तुतलाने वाला पहला बच्चा मैं ही हूँ। इस तरह दादी की भाषा स्वतः ही मेरी मातृभाषा बन गई। 

मेरी दादी ने कभी मुझे या मेरे भाई को कहानियाँ सुनाई हों, ऐसा नहीं है। दादी तो एक जुझारू महिला थीं जिनका आधा जीवन बहुत कठिन परिस्थितियों में बीता था जिसने उन्हें काफ़ी हद तक एक कठोर महिला बना दिया था। दादी हँसती तो बहुत थीं, लेकिन और दादियों की तरह हमें कहानियाँ नहीं सुनातीं थीं। हाँ, अपने दौर की बातें कभी कभी बनाती थीं। शायद वे हमें अपनी जवानी के दुःख भरे दिनों की बातें नहीं सुनाना चाहती थीं या फिर हमें सुनाते हुए वे ख़ुद उन दिनों को दोबारा जीना नहीं चाहती थीं। पर कई बातें मज़े की होती थीं और मुझे आज भी उनको सोच सोच कर मज़ा आता है। छोटी बुआ तब शायद १०-१२ साल की रही होंगी जब एक दो साल लगातार कश्मीर में भूकम्प के झटके आते रहे थे। गर्मियों के दिनों में परिवार तीन मंज़िला मकान के ऊपरी हिस्से में रहता था। कश्मीर में ऐसा ही होता है, लोग सर्दियों में निचले हिस्से में और गर्मियों में ऊपर के हिस्से में रहते हैं। दादी कहती थीं कि ज्यों ही बुआ भात से भरा हुआ पतीला चूल्हे से उतार रही होतीं और भूकम्प आता था तो वह हड़बड़ाकर पतीला खिड़की से बाहर फैंक देती थी। भूकम्प थमता और फिर से चावलों का नया देग चूल्हे पर! दोनो माँ-बेटी भूकम्प से बहुत डरती थीं। 

दादी की छोटी बहन उनसे कुछ साल छोटी थीं और उन दिनों में छोटी उम्र से ही लड़कियों को घर के काम काज सीखने पड़ते थे। तो दादी जी जान से इस बहन को सिखाती कि बाद में ससुराल में उसे कोई समस्या न हो। एक दिन जब बार बार समझाने पर भी छोटी बहन को कढ़ाई का एक भाग सही से काढ़ना नहीं आया तो खीज कर दादी ने अपने सर पर रखी पानी की मटकी उसके हाथ पर दे मारी और फिर पूरी ज़िन्दगी छोटी बहन ने सभी को अपनी बाँये हाथ की तर्जनी दिखा दिखा कर सुनाया कि किस तरह उनकी अँगुली पर चोट लगी थी, किस तरह पानी गिरने से उनके कपड़े और फ़र्श पर बिछे हुए घास की चटाइयाँ ,वगु, गीले हो चुके थे और कैसे वह हक्की बक्की होकर रोना भी भूल गई थी। तर्जनी मेरे हाथ में देते हुए उन्होंने मुझे यह कहानी तब सुनाई थी जब मैं दसवीं में पढ़ता था और दादी की बहन शायद ८०-८२ साल की थीं ! दादी इतनी कड़क और हर चीज़ में बारीक़ी ढूँढने वाली थीं, यह मैं नहीं जानता था। दादी, उनकी बहन, बुआ, मेरे पिता के बचपन की ऐसी ही कई घटनाओं और मुझे, एक कड़ी जोड़ती है और वो है, पिछले लगभग सत्रह-अट्ठारह सौ सालों से बहती आ रही कश्मीरी भाषा की सरिता। जिसे मेरी दादी, उनकी दादी, उनकी परदादी और सदियों पहले के पूर्वजों ने मिलकर संवारा। इनमें लल द्यद् (द्यद् का मतलब है बूढ़ी दादी या नानी माँ) भी शामिल हैं जो कश्मीरी के सबसे पहले कवियों में से एक थीं। भाषा तो वह अमृत है जिसे पिए बिना आदमी रुपी बेल फल फूल नहीं सकती। ज़बान ही इन्सान की पहली पहचान होती है, शायद इसीलिए वह मातृभाषा कहलाती है।

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