Tuesday, May 26, 2015

जीवन और सृजन

Poonam Girdhani writes about the Urdu Authors' Workshop help by Pratham Books in April.


उस रोज़ मैं सुब्ह 5 बजे उठी, जो मेरा रोज़ का मामूल न था। सूरज अभी निकला नहीं था पर सुब्ह होने का अहसास चारों तरफ़ फैला हुआ था, हवा अलसाई हुई थी और जिस्म को ऐसे छू रही थी मानो उसके करवट लेने के बीच मैं आ गयी हूं। और मैं भी किसी ढीठ बच्चे की तरह उसकी हर करवट में आड़े आ रही थी, लेकिन मुझसे ज़्यादा ढीठ तो वो नीम का दरख़्त निकला जो न सिर्फ़ हवा से अठखेलियां कर रहा था बल्कि उसे छेड़ने के बाद मंद-मंद मुस्कुरा भी रहा था। हवा और पेड़ की ये अठखेलियां माहौल में एक रक़्स पैदा कर रही थी। झूमते-झामते दरख़्तों का नृत्य, हवा की लय और पंछियों का कलरव और पीछे से हल्का नारंगी रंग लिये उगते सूरज की रोशनी, स्टेज पूरी तरह सेट था। एक ग़ैर मामूली दिन की शुरूआत शायद यूं ही होती है।

Urdu authors workshop के पहले दिन मुझे हर तरफ़ कहानियां तैरती हुई दिखाई दी, चाय की केतली में से निकलती भाप, मानो बता रही हो कि उसके पेट में कुछ कहानियां पक रही हैं, उसे जो खोला तो खौलते हुए पानी की आवाज़, वाक़ई कोई कहानी बयान कर रही थी, (हालांकि अभी तक मैं उसे decode नहीं कर पाई हूं)

प्रथम बुक्स और दिल्ली उर्दू अकादेमी की जानिब से हो रही इस वर्कशॉप में मिले जुले चेहरे थे, जिनमें से कुछ कई सालों से बच्चों के लिए लिख रहे थे तो कई नौजवान लेखक थे। कुछ नज़्में लिखते थे, तो कुछ मज़मून, पर ज़्यादातर उर्दू रिसालों के लिए कहानियां लिख रहे थे। प्रथम बुक्स की तरफ़ से हमारी एडिटोरियल टीम से मनीषा चौधरी, बैंगलूरू से माला कुमार और दिल्ली से राजेश खर, फैय्याज़ और मैं वहां मौजूद थे। और दिल्ली उर्दू अकादेमी की नुमांयदगी कर रहे थे जनाब अनीस आज़मी जिनके साथ के बग़ैर ये वर्कशॉप मुमकिन न थी।

चूंकि Workshop से हमारी मुराद ये नहीं थी कि हम ठोक-पीट कर ये बतायें कि बच्चों के लिए कैसे लिखा जाना चाहिए, बल्कि हमारी कोशिश ये थी कि उर्दू में लिखने वालों के साथ एक संवाद क़ायम किया जाये। कुछ अपनी कहें कुछ तुम्हारी सुनें की तर्ज़ पर इस वर्कशॉप को डिज़ायन किया गया था। जो बेहद कारगर साबित हुई। प्रथम बुक्स की बुनियाद कैसे रखी गयी, किस तरह की किताबें हम छापते हैं, और कैसे हर बच्चे के हाथ में किताब देखने की हमारी कोशिशें पिछले दस साल से चल रही हैं, मनीषा चौधरी ने इस बारे में तफ़्सील से बात की, “बच्चा आज़ाद ख़्याली से किताब पढ़ सके, ख़ुद-ब-ख़ुद उसे अपनी पसंद की किताब पढ़ने की ख़्वाहिश पैदा हो, ऐसा तभी मुमकिन होगा जब छोटी उम्र से ही उसके पास पढ़ने को किताबें हों। और बाज़ार में texts books का अम्बार पड़ा है। किताबों को या तो ज्ञान बांटने का ज़रिया बनाया गया है या फिर एक business opportunity की तरह पेश किया गया है या फिर नौकरी पाने के ज़रिए की तरह। फिर रही सही कसर उसे दीन से जोड़ कर पूरी की गयी है। सिर्फ़ मज़े के लिए या कहें कि pleasure reading material और वो भी बच्चे की मादरी ज़बान लिखी गयी किताब बाज़ार से ग़ैरमौजूद है। इन्हीं के मद्देनज़र प्रथम बुक्स ने लेवल रिडिंग मैटेरियल, क्वालिटी रिडिंग मैटेरियल छापना शुरू किया”

माला कुमार ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आप उम्र या अनुभव में कितने ही बड़े क्यों न हो जायें, ज़रूरी है कि आप दिल से बच्चे बने रहें। “कहानियों को समय,देश, काल से परे होना चाहिए। उसे किसी सीमा में नहीं बांधना चाहिए। Alice in wonderland कहानी को डेढ़ सौ साल हो गये हैं लेकिन आज भी ये उतनी ही लोक-प्रिय है जितनी की तब थी, क्योंकि इसे बेहद ख़ूबसूरती के साथ लिखा गया है।बच्चों को ज्ञान मत दीजिए, उन्हें ये क़ुव्वत दिजिए कि वो ख़ुद अच्छे-बुरे की पहचान कर सकें।”

अनीस आज़मी ने उर्दू के बड़े बड़े अदीबों का हवाला देते हुए कहा कि “हाली से लेकर ख़्वाजा अहमद अब्बास, ज़ाकिर हुसैन और बड़े बड़े नामचीन लेखकों ने बच्चों के लिए लिखा, क्योंकि उनका मानना था कि ये सबसे अहम काम है। इस रवायत को और संजीदगी से आगे बढ़ाने की ज़रूरत है।” 

राजेश खर ने बताया कि कैसे हम ज़बानें खो रहे हैं, और ऐसा हुआ तो बेहद अफ़सोस की बात होगी।

“क्या हम चाहते हैं कि उर्दू ज़बान ख़त्म हो जाये ? अगर नहीं, तो फिर हमें बच्चों के अदब पर ध्यान देने की बेहद ज़रूरत है, क्योंकि बच्चे हमारे मआशरे का सबसे अहम-तरीन हिस्सा है। लोग समझते हैं कि बच्चों के लिए लिखना आसान काम है, अगर ऐसा है तो फिर हम ये आसान काम क्यों नहीं कर रहे”

फैय्याज़ जो प्रथम बुक्स के साथ बहैसियत उर्दू एडिटर जुड़े हुए हैं और प्रथम के साथ प्राइमरी एजुकेशन को लेकर काम कर रहे हैं, उन्होंने अपने काम का ज़िक्र करते हुए कहा कि “मेरा तजुर्बा ये रहा है कि प्रायमेरी स्कूल का बच्चा चाहे आसाम का हो या हिमाचल प्रदेश का, सबको लिखने-पढ़ने में बेहद मुश्किल आ रही है। उसकी वजह है कि बच्चों की उम्र और हर्फ़ पहचानने की क़ुव्वत को अनदेखा कर किताबें बन रही हैं। हर उम्र में बच्चे की नफ़सियात और उनका रद्दो-अमल करने की क्षमता अलग-अलग होती है।हर बच्चा अलग अलग तरीक़ो का इस्तेमाल कर लफ़्ज़ या जुमले पहचानते हैं, जैसे Chunk coding , Psycho linguistic approach, guessing वग़ैरह।”

बाप रे बाप!! वो कौन पहुंचे हुए लोग हैं जिन्हें लगता है कि बच्चों के लिए लिखना बचकानी बात है? :) 


वहां आये तमाम लोगों को ये जानकर फ़ख़्र महसूस हुआ, कि इतना काम और इतनी रिसर्च बच्चों के अदब को लेकर हो रही है उसका नतीजा ये निकला कि बहुत से लोग जो अब तक बच्चों के लिए नहीं लिख रहे थे, उन्होंने भी इस वर्कशॉप में नई नई कहानियां लिखीं। और ये जानकर शायद आपको ताज्जुब हो कि उनमें से कुछ लोगों ने बेहद शानदार कहानियां लिखीं। 

कहानियां स्कूल के बस्ते, पैंसिल, टिफ़िन बॉक्स की, जिनमें वो बच्चों से भी ज़्यादा चंचल, ज़िन्दादिल और चहकते, मुस्कुराते दिखे। पंखे और ट्यूबलाइट की नोक-झोंक भी थी, टूथब्रश बनने के सफ़र का भी लुत्फ़ उठाया तो नज़्मों ने भी इन सबके बीच अपनी मौजूदगी दर्ज की।

मैं ये दावा तो नहीं कर सकती कि इस दो दिन की वर्कशॉप से कोई क्रान्तिकारी परिवर्तन हम ला पाये, पर इस बात पर ज़रूर यक़ीन है कि इस दो रोज़ा वर्कशॉप ने एक बीज तो बो दिया है, लिखने वालों में एक प्यास तो जगा दी है कि वो पहले से और बेहतर लिखें और लिखने से ज़्यादा दूसरों का लिखा पढ़ें ताकि ये अंदाज़ा रहे कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में क्या क्या लिखा जा चुका है और क्या लिखा जा रहा है।

हर शाम जब मैं घर लौटती तो ऐसा लगता मानो पेड़ों की शाखें मेरे पीछे-पीछे चली आ रही हों, उन छोटे-छोटे बच्चों के हूजूम की मानिन्द, जो गली में आये जादूगर के पिटारे के खुलने का इंतज़ार करता है। अब वो मेरी कहानी के महज़ किरदार न थे, बल्कि ख्वाहिशमंद थे उन कहानियों को सुनने के जो मैं बुनना चाह रही हूं।


You can also read an account of the workshop that featured in The Hindu.

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