Sunday, May 10, 2015

अब इसको क्या नाम दूँ?

For Mother's Day, Rajesh Khar (editor, Pratham Books) shares how his mother motivated him to become the person he is now. In this piece, one sees how our mother's love and the little things she does for us impact who we become and the things we do.


मैं इतना पतला सा और देखने में दुर्बल था कि स्कूल के शिक्षक भी मेरे लिए चिंतित रहते थे| दोस्त तो बहुत से थे पर बच्चों के साथ खेलने में डर सा लगता था, क्योंकि वे मुझे तंग करते, छेड़ते और परेशान करते थे| घर लौट कर कई बार माँ से शिकायत भी करता| माँ कहतीं कि कमज़ोर समझ कर तुमको तंग करते हैं, ये कोई असली ताक़त नहीं होती| तुम इतना ताक़तवर बनाओ खुद को कि वे तुम्हें परेशान न कर पाएँ| मैं उनका मुँह ताकता रहता| भला, मैं कोई पहलवान बन जाऊँ!

जो भी हो, माँ मेरा मन शांत कर ही देती थीं| मैं कुछ ही देर में छोटे भाई के साथ खेलकूद में मस्त हो हाता था| एक दिन मैं स्कूल से बड़ा उत्साहित सा घर लौटा और माँ को एक पत्रिका दिखाई जिसमें मेरे एक शिक्षक का चित्र छपा हुआ था| मैंने उन्हें बताया कि उस शिक्षक को एक प्रतिष्ठित सम्मान मिला था| मैं तो खुश था ही कि ऐसे शिक्षक को मैं जानता हूँ, माँ भी खुश हुईं और मेरे सिर को सहलाती हुई बोलीं कि कभी तुम्हारा नाम भी कहीं छपा हुआ पढ़ने को मिले तो क्या मज़ा आएगा? मैं सोचता रहा कि ऐसा कैसे होगा?

माँ ने मुझे कहा कि अगर तुम लिखना चाहते हो तो लिखो, तुम बड़े अच्छे चित्र बनाते हो तो लिख भी ज़रूर लोगे| और तुम तो कितनी किताबें भी पढ़ते हो| पढ़ना ज़रूरी है| मैं छोटा था, पाँचवीं में पढ़ता था और खूब सारी कहानियाँ पढ़ता था| पहली बार जब मेरी एक कविता मोहल्ले की पत्रिका में छपी थी तब मैंने घूम घूम कर सब को अपना नाम दिखाया था| उस दिन खेलते हुए बच्चों ने उतना परेशान नहीं किया था|

किताबें पढ़ना जारी रहा| माँ ख़ुद मकान मालिक के बेटे से जो यूनिवर्सिटी के पुस्तकालय में काम करता था, किताबें मंगवा कर पढ़ती थीं| उन्हें देखते  देखते मेरा भी किताबें पढ़ने का शौक जारी रहा| मैं अक़सर ही माँ को अपनी किताबों की कहानियाँ सुनाता था, वे कभी खाना पकाते हुए सुनती, तो कभी झाड़ू लगाते हुए| हम ऐसे ही ढेरों बातें करते|

कुछ सालों में, स्कूल की पत्रिका में और फिर कॉलेज की पत्रिका में, कभी कभी मेरा नाम आने लगा तो वे खुश हुईं| मुझे अक़सर कहतीं कि मेरा नाम देखकर उन्हें बड़ा अच्छा लगता है| मैं लगातार कोशिश करता रहता कि मैं ऐसा क्या करूँ कि इन स्कूल-कॉलेज की पत्रिकाओं को छोड़कर  मेरा नाम और किसी जगह कैसे आ पाए| मैं ढेरों किताबें पढ़ता, हर तरह की किताबें, हिन्दी, अँग्रेज़ी की किताबें, तरह तरह की किताबें पढ़ता कि लिखने वालों की शैलियाँ शायद समझ पाऊँ| पर ऐसा कभी हुआ नहीं|

कुछ साल और बीते तो मैंने बड़ी हिम्मत करके एक स्थानीय समाचार पत्र में एक लेख छपने भेजा| संपादक ने न केवल उसे प्रकाशित किया बल्कि मुझे वैसे ही और साप्ताहिक लेख लिखने को भी कहा! मैं बड़ा खुश हुआ| उस दिन से मेरा एक साप्ताहिक स्तंभ लेखक का परिचय बनने लगा| 'रूरल सिनेरियो' एक कामयाब स्तंभ रहा और कई जगहों से कई लोगों के फ़ोन मेरे लिए घर पर आने लगे| माँ को वे फ़ोन लेने में बड़ा मज़ा आता| माँ ने यूँ ही कई बार बातों बातों में मुझसे कहा था कि उनके बचपन की सबसे पुरानी यादें रेडियो पर प्रसारित गीतों और नाटकों से जुड़ी हुईं थीं| उनके छुटपन में भारत-चीन लड़ाई के समय वे लोग घंटों रेडियो के सामने बिताते थे| यह बात मेरे ज़हन में सदा से ही थी और हमारे घर पर भी रेडियो खूब बजता था| मैं कॉलेज के समय से ही रंगमंच के साथ जुड़ गया था और एक बार यूँ ही रेडियो पर वार्ता का भी अवसर मिला| उस दिन तो माँ मेरी आवाज़ रेडियो पर सुनकर बहुत खुश हुईं थीं|

उन्होने न जाने किस किस को बताया, क्या कुछ कहा और कितनी देर तक मेरे रेडियो पर आने की बातें कीं| जब रेडियो पर मैंने नाटकों में भाग लेना शुरू किया तब तो उनकी खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा| उन्होने मोहल्ले भर में लोगों को चाय पिलाई, लड्डू बाँटे!

बहुत बाद एक दिन जब मैं एक टीवी कार्यक्रम निर्देशित कर रहा था और महिला सशक्तिकरण पर कुछ काम कर रहा था तब मुझे अचानक माँ की बात समझ आई..."तुम खुद को इतना ताक़तवर बना लो कि कोई तुमको तंग न कर पाए|" मेरे आगे से अचानक समय की सभी परतें गिर गयीं और दूर, बहुत दूर एक दुबला पतला लड़का खड़ा था, जिसे क्रिकेट खेलते हुए बच्चे परेशान कर रहे थे| किताबों के माध्यम से, कहानियों-क़िस्सों के ज़रिए, मेरा नाम छपा हुआ देखने की चाह में छुपा कर, मेरी आवाज़ रेडियो पर सुनने की इच्छा से कब मेरी माँ ने मुझे उस कमज़ोर बच्चे से एक ठीक ठाक ताक़तवर  इंसान बना दिया था, मुझे पता ही नहीं चला!

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