Saturday, February 21, 2015

माँ से मिले कई स्वाद

Today is International Mother Language Day and our blog is turning multilingual today. We are hosting a series of blog posts by different authors, illustrators, parents, educators and children - sharing their thoughts on languages and more. International Mother Language Day is an observance held annually on 21 February worldwide to promote awareness of linguistic and cultural diversity and multilingualism. 2015 is the 15th anniversary of International Mother Language Day.

(This post was sent in by Manisha Chaudhry - head of content development at Pratham Books. We've been receiving several personal narratives for our blog celebration of languages.  Here's Manisha's touching ode to her mother, forever etching in our minds our mother's love with our love for the language of our childhood.)


मुझे अपना अन्नप्राशन याद नहीं है पर ज़रूर सुखद रहा होगा क्योंकि मेरी माँ बताती थीं कि जब मैं छोटी थी तब 'दाल- रोटी- सब्ज़ी' की रट लगाती थी तो तब तक चुप नहीं होती थी जब तक वो मिल न जाय। माँ के हाथ के बनाये खाने का स्वाद तो आज तक ज़ुबाँ पर रखा है साथ में कई और अन्नप्राशन हैं जो मैं माँ से जोड़ती हूँ।

उनसे उनकी कस्तूरी सी याद अपने दिल में संजोये रखती हूँ. उनके मीठे स्वर में 
'...नन्ही कली सोने चली, हवा धीरे आना...' 
शायद सुर और शब्द का वह पहला मिश्रण था जिसने मेरी सुख से पहचान करायी । 

अक्कड बक्कड़ बम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरे सौ 
सौ में लगा धागा, चोर निकल के भागा को धीमे , फिर तेज़ , फिर और तेज़ी से कहना मेरा पहला शब्दों का खेल था। 

लय, सुर और शब्दों के जादू को माँ के ही सिखाये गीतों में मैंने महसूस किया। 
बैलों की घंटी बजी रुन टुन टुन , 
कहीं बंसी की धुन , कहीं पायल की छुन ,
रे सुन, रे सुन , 
चलो खेतों की ओर, जहाँ कोयल का शोर 
जहाँ गेहूँ की बाल लेती मादक हिलोर , 
दूर कहीं भौरों की गुन गुन गुन। 
जैसे सरल, सरस तुकांत छंदों से भाषा से परिचय गहरया. 

बचपन बीतने के बाद किशोरावस्था में भी यह सिलसिला जारी रहा और मातृ भाषा के ख़ज़ाने के द्वारपाल की तरह माँ मुझे नए रत्नों की झलक दिखलाती रहीं। 
इस सोते संसार बीच 
जग कर सज कर रजनी बाले 
कहाँ बेचने ले जाती हो

यह गजरे तारों वाले पर कत्थक शैली में उनके भाव नृत्य के ज़रिये मैंने भाषा के अन्य कलाओं से संबंधों को महसूस किया। 

आज वह मेरे साथ नहीं हैं पर अपनी भाषा के ख़ज़ाने की चाभी ज़रूर मेरे हाथ थमा गयी हैं। मेरी माँ की भाषा हिंदुस्तानी थी जिसमे उर्दू , अवधी , बृजभाषा का ताना बाना कुछ ऐसे बुना हुआ था की हर बात को कहने के कई अंदाज़ थे।  हर अंदाज़ में रस था। हर अंदाज़ चुटीला था। 

आज यूनेस्को द्वारा घोषित मदर लैंग्वेज डे है।  माँ और मातृ भाषा के अंतरंग सम्बन्ध को आज मैंने फिर पहचाना है। मेरी भावनाओं की भाषा मेरी मातृ भाषा है।

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