Thursday, December 29, 2011

Pratham Books Champion : Sandhya Sharma

As the International Year of the Forest draws to a close, we are running the 'Awareness Today for a Greener Tomorrow' campaign. We asked our AWESOME community if they would be volunteer to become a Pratham Books Champion and conduct storytelling sessions based on the book "A King Cobra's Summer'. And again, our friends volunteered eagerly. We will be sharing the stories of all our champions through our blog.
 
Today's story comes from Sandhya Sharma who conducted a storytelling session in Delhi. Sandhya is doing an MA from IGNOU and is also working as a Hindi teacher in a private school in Delhi. Sandhya has already conducted a storytelling session previously. You can read about her previous experience here. This time, the bookreached Sandhya a little late. But Sandhya conducted the session at a later date and will be conducting another one too. We love our champions!Sandhya wrote to us about her session and said ...
 मैंने सोमवार शाम 5.30  बजे को  कहानी सुनाने के लिए बच्चों को इकट्ठा किया I अभी तो सिर्फ 8 बच्चे ही आये I खैर शनिवार को वे अपने और भी दोस्तों को लेकर आएंगे I

पहले मैं यह सेशन  सिर्फ अपने स्कूल के बच्चों के लिए ही रखना चाह रही थी I पर हमारे स्कूल में बाल साहित्य का काफी अच्छा भण्डार है  और हाथ में कोई अच्छी कहानी आते ही मैं अपनी हर कक्षा को मौका मिलते ही सुना ही देती हूँ I

बच्चे 4 -8 वर्ष तक की आयु तक के थे I पहले हमने चित्रों को देखकर कहानी बनाई I उसके बाद मैंने उन्हें कहानी सुनाईI
बीच बीच में बच्चे अपने अनुभव (कुछ सच्चे, कुछ झूठे ) भी जोड़ते चले I जैसे -मैं जब खो गई थी तो मुझे कैसा लगा था, काला भी वैसे ही डर रहा होगा, मैंने भी सांप को देखा है, मैं बिलकुल नहीं डरा आदि- आदि I  साथ साथ वे कहानी के बारे में अपने पूर्वानुमान भी जाँच रहे थे (मैंने कहा था न ये डांस नहीं लड़ाई कर रहे हैं; देखा,सांप  सच्ची में टोइलेट  कर रहा है )I गप्पें मारने वाले भी पीछे नहीं थेI एक ने कहा -"मेरा एक  दोस्त तो सांप  से बिलकुल नहीं डरता Iवह तो सांपो के साथ ही सोता है I"


जैसा कि कहानी ख़त्म होने के बाद भी ख़त्म नहीं होती ,अब बच्चों को दोबारा कहानी सुननी थी I इस बार सुनाने वाले वे खुद थे और सुनने वालों में मैं भी शामिल थी I

फिर मैंने उन्हें किताब के साथ छोड़ दिया I वे चित्र देखते रहे और कहानी के बारे में बात करते रहे और एक दूसरे को सुनाते  भी रहे I और अंत में जैसा होता ही है उन्हें पुरानी कुछ कहानियां दोबारा सुनानी होती हैं I तो एक -दो पुरानी कहानियां सुनी- सुनाई गईं (नीचे से ऊपर,निराली पोशाक,बुढ़िया की रोटी-हालाँकि सुनाने वाले वे खुद ही होते हैं ) और शनिवार को फिर से आने का वादा करके बच्चे चले गए I




Thank you Sandhya for spreading the joy of reading!

Click here to read the stories sent in by all the Pratham Books Champions.

Note : If any of you want to be a Pratham Books Champion and join us on our journey of getting 'a book in every child's hand', write to us at web(at)prathambooks(dot)org.

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