Sunday, February 21, 2010

कुछ आपबीती कुछ जगबीती

(21st February is International Mother Language Day and we have a series of posts related to this subject on our blog today. This post has been written by Manisha Chaudhry from our editorial team)

हाल में एक प्रकाशक मित्र ने पूछा की बचपन की यादों की कंदराओं में कौन सी हिंदी की कहानी छुपी बैठी है?
यादों को टटोला तो सबसे पहली छवि 'पराग' की उभरी. "आओ मेरी खिड़की में बैठो" और जाने कितने स्तम्भ जिनको पढने का बेसब्री से इंतज़ार होता था और भाई बहनों में छीना झपटी हो जाती थी. उम्र के साथ 'धर्मयुग', 'कादम्बिनी', 'नवनीत', 'सापताहिक हिंदुस्तान' में माँ की चहेती शिवानी, मालती जोशी, मेहरुन्निसा परवेज़, मन्नू भंडारी, राजेंद्र यादव और कभी कभार कमलेश्वर जी से परिचय बढ़ाने का मौका मिलने लगा.

जब तक भारी भरकम उपन्यासओं को उठाने-निभाने का आत्मविश्वास नहीं आया था तब तक पाठ्य पुस्तक के संकलन जिंदाबाद जिनके ज़रिये प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, दिनकर बच्चन से मुलाक़ात हुई. महादेवी वर्मा की मर्म स्पर्शी लेखनी भी कहीं दिल की गहरायिओं तक उतर कर ऐसी बैठी की आज भी 'अतीत के चलचित्र' और 'श्रंखला की कड़ियाँ' मेरे अतीत और वर्तमान की श्रंखला का हिस्सा बन गयी हैं.

आज जब मेरे बच्चे उन्हीं लेखकों का सामना सिर्फ कोर्स के हिस्से के रूप में करते हैं तो कहीं यह ख्याल मन को कचोटता है की उनका रिश्ता मात्री भाषा से, अपनी मादरेज़ुबान से इंतना क्यों बदल गया? क्यों मुझे एक सांस्कृतिक पर्यटक के जैसे उन्हें ईद गाह के हामिद के साथ कसबे के रास्तों में घुमाना ज़रूरी हो जाता है? क्यों मन्नू भंडारी की 'अकेली' में एक बेसहारा स्त्री की वेदना और उसकी जिजीविषा उनको छू सके इससे पहले रिश्तों, मोहल्लों, बिरादरियों स्त्री विमर्श से जुड़े कितने वार्तालाप मुझे करने पड़ते हैं. मेरे दोनों बच्चों को हरी पोट्टर पढ़ते समय ऐसी कोई ज़रुरत नहीं हुई. आज जब वे 'टु सर विथ लव' पढ़ते हैं जो उनके परिवेश से भिन्न है, तो भी उन्हें उसे समझने में कोई अड़चन नहीं आती.

पर हिंदी साहित्य के साथ ऐसी मुश्किलें क्यों आती हैं? कहीं हम वैश्वीकरण से इतने अभिभूत तो नहीं हो गए हैं की हमे अपना घर का पता, अपना परिवेश बिसारना भी सामान्य लगता है? विश्व बाज़ार में अपना स्थान बनाने के लिए हम बड़े फक्र से कहते हैं की भारत में मध्य वर्ग की कितनी बड़ी संख्या अंग्रेजी अच्छी बोलती है. पर मुए अँगरेज़ हमारी अंग्रेजी की खिल्ली उड़ाने से बाज़ नहीं आते हैं! इन्दिअनिस्म्स को चटखारे ले ले के सुनाते हैं!
सच तो यह है की मध्य वर्ग का अधिकाँश भाग अंग्रेजी पढ़ लिख लेता है पर यह बहुत निम्न स्तर का भाषाई ज्ञान है. अंग्रेजी के उत्कृष्ट साहित्य से उनका कोई वास्ता नहीं पड़ा है. साथ ही, अपनी भाषाओं से उसका रिश्ता कमज़ोर होता जा रहा है. अपनी भाषाओं के साहित्य क्या ज्ञान तो उन्हें नहीं के बराबर है. हमें अपने विचार भावनाओं की सरल, सहज अभिव्यक्ति के लिए किसी भाषा पे तो अधिकार होना चाहिए.

संस्कृति निरंतर रूपांतरित होती रहती है और आर्थिक सामाजिक परिवेश के साथ उसका बदलना स्वाभाविक है. मीडिया का प्रभाव भी हमारे जीवन की नयी वास्तविकता का अभिन्न हिस्सा हो चला है और भाषा भी इससे अछूती नहीं रह सकती परन्तु अपनी भाषा उससे जुडी संस्कृति को हम जिस उपेक्षा से देख रहे हैं उसे देख के ज़रूर ऐसा लगता है की कहीं हम अपने ही देश में पर्यटक बन जाएँ. कहीं ऐसा हो की हम अपनी संस्कृति को अपने प्यार से इतना वंचित कर दें की हमारे बच्चों को इंडियन studies विभागों के माध्यम से अपनी दादी नानियों के परिवेश को समझना पड़े.

क्या यह एक 'भाषा fundamentalist' की गुहार है? क्या यह एक हिंदी पढ़ाने वाली त्रस्त माँ की पुकार है? या अपनी भाषा से अपनेपन का रिश्ता बनाने का इसरार है?!

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