Wednesday, August 5, 2009

क्या बच्चे बदल गए हैं?

आम तौर पर बच्चों के बारे में यह कहा जाता है कि उनमें पढने की इच्छा ही नहीं है I जब भी बड़ों से बात होती है, वे बच्चों के बारे में शिकायतों का पुलिंदा खोल लेते हैं, "आज कल पहले जैसे बच्चे कहाँ रहे?" या फिर, "पढने को बोल दीजिये तो चेहरा ही लटक जाता है I" मैं जितना समय बच्चों के साथ बिताता हूँ और जितना उन्हें देखता हूँ, वे मुझे सदा ही सीखने को उत्सुक दिखते हैं I


कुछ दिन पहले मैं मुंगेर (बिहार का एक जिला और एक छोटा शहर भी) गया था I शहर से कुछ ही दूर एक मध्य विद्यालय जा कर बच्चों से मिलने का अवसर मिला I मैं वहां लगभग पौने दस बजे पहुंचा था I उस दिन बच्चों की कंप्यूटर क्लास थी I प्रथम की रोमिंग लैपटॉप योजना के शिक्षक क्लास लेने वाले थे, वे चुने हुए स्कूलों में ४५ दिनों तक क्लास लेते हैं और बच्चों को कंप्यूटर की बुनियादी जानकारी देते हैं I उन्हें माइक्रोसॉफ्ट वर्ड, एक्सेल तथा पॉवर-पॉइंट में काम करना सिखाया जाता है I यह कक्षा सुबह १० बजे से होती है I सोच रहा था कि मैं जल्दी पहुँच गया और अहिस्ता - अहिस्ता क्लास की तरफ चल रहा था I लेकिन क्लास में पहुँच कर एक भिन्न ही दृश्य दिखाई दिया I

बच्चे पहले से ही बैठे हुए थे और क्लास जारी थी! जब मैंने उनके शिक्षक से पुछा तो उन्होंने बताया कि बच्चों को इस क्लास की बड़ी प्रतीक्षा रहती है और ये समय से पहले ही क्लास में पहुँच जाते हैं I अब क्यूंकि बच्चे जल्दी पहुँचते हैं तो हम भी जल्दी चले आते हैं I मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि आज के ज़माने में, जहां एक और शिक्षक यह शिकायत करते हैं कि बच्चे समय पर स्कूल नहीं आते या फिर नियमित नहीं आते, वैसे में बच्चों का जल्दी आना एक सुहाना एहसास था I इतना ही नहीं, बच्चों ने यह भी सिद्ध कर दिया कि वे ही शिक्षण प्रणाली के सबसे मूल और ध्रुव तंत्र हैं जो समय के साथ नहीं बदला है I उन में कुछ नया करने और सीखने का मानव- सहज उत्साह आज भी उतना ही प्रबल है, जितना कि प्रागैतिहासिक मनुष्य में था I बदले हैं तो हम बड़े बदल गए हैं - हम में आज पहले जितनी लगन से सिखाने कि क्षमता नहीं रह गयी है I या फिर यूँ कहिये कि हम 'कामचोर' हो गए हैं और बच्चे बलि का बकरा बन कर रह गए हैं I

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